शिवहर विधायक चेतन आनंद संघर्ष से विरासत तक, शिवहर का नया अध्याय



शिवहर की राजनीति में चेतन आनंद एक मिसाल के तौर पर उभरे हैं। जिस ज़िले से उनके पिता आनंद मोहन सांसद बने थे, वहीं से विधायक बनकर चेतन ने न केवल बिछड़ी हुई राजनीतिक विरासत को पुनर्जीवित किया, बल्कि पिता की रिहाई के वर्षों लंबे संघर्ष को अंजाम तक पहुँचाया और माँ के चेहरे पर मुस्कान लौटाई।
चेतन का शिवहर से रिश्ता केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सहरसा से अधिक प्रिय शिवहर* को माना और अपनी ऊर्जा यहाँ समर्पित की। यह टुच्ची सोच है कि “बाहरी भगाओ”ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि उनकी अपनी बहुएँ भी बाहर से ही आती हैं और वंश को आगे बढ़ाती हैं। बिहार सबका है; यहाँ कोई भी, चाहे जिस ज़िले से हो, अगर योग्यता और सामर्थ्य है तो चुनावी मैदान में उतर सकता है। सच यही है—आनंद मोहन जैसा कोई नहीं हो सकता, लेकिन चेतन आनंद जैसा बन पाना भी आसान नहीं है।
उनके कार्यकाल में शिवहर ने उल्लेखनीय विकास देखा—सड़कों का जाल, स्कूलों का उन्नयन, अस्पताल से लेकर डिग्री कॉलेज तक की उपलब्धियाँ। उनके अथक प्रयासों से मेडिकल कॉलेज की घोषणा हुई, सलेमपुर में औद्योगिक क्षेत्र के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। माँ सांसद और स्वयं विधायक होने के नाते दशकों से ठंडे बस्ते में पड़ी रेल परियोजनाओं को गति मिली और रीगा चीनी उद्योग जैसे पुराने मुद्दों पर भी ठोस पहल की गई।
काम तो बहुत हुआ, लेकिन राजनीतिक विद्वेष ने जनता की आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। विरोधियों को यह पच नहीं रहा कि जो वे वर्षों मिलकर नहीं कर पाए, वह एक नौजवान अपने कार्यकाल में कर गया। यही वजह है कि उनमें रोष है“हमसे बेहतर परफॉर्मेंस कैसे कर लिया?” और समर्थकों में यह हतोत्साह “काम तो हुआ है, पर अभी अपार गुंजाइश है।”
असल में जो कभी हुआ ही नहीं, जब अब धरातल पर आंशिक रूप से दिखने लगा, तो जनता को यह ऊँट के मुँह में जीरा प्रतीत होता है। समस्या का हल मिल बैठकर निकाला जाता है, बगावती तेवर से नहीं। यह कहना भी सही नहीं कि स्थानीय नेताओं को मौका नहीं मिला। अब शिवहर की जनता खुद तुलना कर सकती है—उन स्वनामधन्य तमाम स्थानीय नेताओं के कार्यकाल में क्या हुआ और चेतन आनंद के कार्यकाल में क्या हुआ।

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